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Showing posts with the label हिन्दी व्यंग

सफ़र जारी है और मजिल बिसर गई,

सफ़र जारी है और मजिल बिसर गई, महोब्बत तो हो गई पर दिलरुबा किधर गई, जाम भी खाली है और महफ़िल भी है उदास उस मैखाने का क्या कसूर जिसके साकी की खबर नहीं याद थी वो ग़ज़ल, अब तो वो भी बिसर गई, होठो पर तो थी अभी अब जाने किधर गई जिस जगह जाने को पाँव बढ़ जाते थे अपने आप अब ना वो गली है, और उसमे अब कोई घर नहीं दुनिया में करता है कोई मुझ से भी महोब्बत, मुझे क्या मालुम मुझे कोई खबर नहीं (keval gazal hai dosto .. isko filhaal mere haal se naa jodhiyega..)

गाँधी का भारत और जिन्ना का पाकिस्तान

एक बार किसी ने गाँधी जी से पुछा.. आप आजाद भारत में कैसी शिक्षा प्रणाली चाहते है बापू, तो गाँधी जी बोले,,, की जब में किसी कक्षा में बच्चो से पूछु की अगर एक दुकान दार २५ पैसे में एक सेब खरीदता है और १ रूपए में बेचता है तो उसको कितना मुनाफा मिलेगा , और अगर सारे बच्चे जवाब दे की " जेल होगी" ऐसी नैतिक सिख्षा चाहता हु॥ किसी भी व्यापारी को नैतिकता के आधार पर ये हक नहीं है की वो २५ पैसे की चीज़ पर तिगुना लाभ कमाए। आज कल जो जीना साहब की बहस हो रही है की वो महान नेता थे धर्मनिरपेक्ष थे और पाकिस्तान ने उनके सपनो को पूरा नहीं किया .. प्रश्न ये है की क्या हिंदुस्तान ने गाँधी के सपनो का भारत बनाया है ...? आज़ादी के पहले दिन जब पूरा देश उत्सव में डूबा था तब भी गाँधी जी यही कहते थी की उत्सवो से पहेले देश बनाओ। आज तक ये देश तथाकथित आज़ादी के उत्सव में डूबा है,, भ्रस्ताचार की आज़ादी, खून करबे की आज़ादी, फरेब और ज्हूठ की आज़ादी, प्रांतवाद की आज़ादी॥ पैर जो सपने एक आजाद देश के आ व्यकी ने देखे थे जिनको सब राष्ट्र पिता और बापू कहते है वो शयद ५०० के नोट की तस्वीर में बस कर रह गए है,, उस के बह...

लपक झपक तू आरे बदरवा

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हाफ्फ्फ़ ॥ बारिश बारिश और बारिश॥ इंदौर के लोग बारिश के लिए यज्ञ कर रहे थे ३ महीने पहेले। और २ दिन की बारिश ने लगता है उनको भी लग रहा होगा की भगवान् लोगो की पुकार सुनते है॥ पर लगता है सब की तो नही सुनते॥ .कल प्रचंदाकारी बारिश में घर जाते समय उफनाते नालो और उसके किनारों की बस्तियों पर लोगो के घर पर से जाए हुए पानी को देख कर बरसो पहले देखि हुई एक फ़िल्म की याद आ गई ॥ फ़िल्म थी "बूट पोलिश".....जैसा याद आ रहा है .... उसमे डेविड जब जेल में अपने साथियों के मनोरंजन और उनपर प्रभाव ज़माने के लिए राग मल्हार गाता है॥ और वों गाना गता है... "लपक जपक तू आ रे बदरवासर की खेती सूख रही हैबरस बरस तू आ रे बदरवाझगड़ झगड़ कर पानी ला तूअकड़ अकड़ बिजली चमका तूतेरे घड़े में पानी नहीं तोपनघट से भर लारे बदरवा ...बन में कोयल कूक उठी हैसब के मन में हूक उठी हैभूदल से तू बाल उगा देझट पट तू बरसारे बदरवा ..." और गाने के अंत में सच मच मुसलाधार बारिश हूँ जाती है ... और उसको देख कर पहेले वों खुश होता है की उसकी राग मल्हार सफल हो गया ॥ और फ़िर रोने लगता है..... उसे अपने बस्तियों के साथियों की याद आने लगती है॥ ...

सआदत हसन मंटो की कहानी : टोबा टेकसिंह

बंटवारे के दो-तीन साल बाद पकिस्तान और हिंदुस्तान की सरकारों को ख्याल आया कि साधारण कैदियों की तरह पागलों का भी तबादला होना चाहिए। यानी जो मुस्लमान पागल हिंदुस्तान के पागलखाने में हैं, उन्हें पाकिस्तान पहुंचा दिया जाए और जो हिंदू पाकिस्तान के पागलखानों में हैं, उन्हें हिन्दुस्तान के हवाले कर दिया जाए। मालूम नहीं यह बात ठीक थी या नहीं। बहरहाल बुद्धिमानों के फैसले के अनुसार इधर-उधर उंचे स्तर की कांफ्रेंस हुई और आखिरकार एक दिन पागलों के तबादलों के लिए नियत हो गया। अच्छी तरह छानबीन की गई। वे मुस्लमान पागल, जिनके अभिभावक हिंदुस्तान में थे, वहीं रहने दिए गए थे। और जो बाकी थे, उन्हें सीमा पर रवाना कर दिया गया था। यहां पाकिस्तान से, क्योंकि करीब-करीब सब हिंदू-सिख जा चुके थे, इसलिए किसी को रखने-रखाने का सवाल ही न पैदा हुआ। जितने हिंदू-सिख पागल थे, सबके सब पुलिस के संरक्षण में सीमा पर पहुंचा दिए गए। उधर की मालूम नहीं, लेकिन इधर लाहौर के पागलखाने में जब इस तबादले की खबर पहुंची तो बड़ी दिलचस्प और कौतूकपूर्ण बातें होने लगीं। एक मुस्लमान पागल, जो बारह बरस से रोजाना बकायदगी के साथ नमाज पढ़ता था, उससे जब...

सुरा समर्थन / काका हाथरसी

सुरा समर्थन / काका हाथरसी भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं 'कायर' कहँ 'काका', कवि 'बच्चन' ने पीकर दो प्याला दो घंटे में लिख डाली, पूरी 'मधुशाला' भेदभाव से मुक्त यह, क्या ऊँचा क्या नीच अहिरावण पीता इसे, पीता था मारीच पीता था मारीच, स्वर्ण- मृग रूप बनाया पीकर के रावण सीता जी को हर लाया कहँ 'काका' कविराय, सुरा की करो न निंदा मधु पीकर के मेघनाद पहुँचा किष्किंधा ठेला हो या जीप हो, अथवा मोटरकार ठर्रा पीकर छोड़ दो, अस्सी की रफ़्तार अस्सी की रफ़्तार, नशे में पुण्य कमाओ जो आगे आ जाये, स्वर्ग उसको पहुँचाओ पकड़ें यदि सार्जेंट, सिपाही ड्यूटी वाले लुढ़का दो उनके भी मुँह में, दो चार पियाले पूरी बोतल गटकिये, होय ब्रह्म का ज्ञान नाली की बू, इत्र की खुशबू एक समान खुशबू एक समान, लड़्खड़ाती जब जिह्वा 'डिब्बा' कहना चाहें, निकले मुँह से 'दिब्बा' कहँ 'काका' कविराय, अर्ध-उन्मीलित अँखियाँ मुँह से बहती लार, भिनभिनाती हैं मखियाँ प्रेम-वासना रोग मे...

हिममता और महेनता -- यादो का अल्बम -1

चौकिये नही की ये क्या लिखा है, में अभी आप को समझाता हु, बात है सन १९८७ की, जब में ४-५ साल का था, और सब बच्चो की तरह शरारती था पर अपनी धों में कोय रहेने वाला बच्चा था, हुआ कुछ ऐसा की में सब के सामने अखबार ले कर बैठा, सब को प्रभीवित करने के लिए मेने वों अख़बार पढ़ना शुरू किया, सब से अच्छा फिल्मो वाला पेज लगता था, जहा पर सिनेमा में जो फिल्म लगती थी उनके पोस्टर और समाये रहेते थे , जैसे शोले - शान से -- रोजाना ३ खेल ... में एक केथोलिक स्कूल में था, तो ज़ाहिर था की मेरी हिन्दी पर इतना ध्यान नही दिया जाता था जितना अंग्रेज़ी पर, तो मेने फिल्मो के नाम पढ़ना शुरू ही किए थे की सब मुझ पर हँसना शुरू हो गए, मेरे दिनेश भइया, पापा॥ मुझे लगा मेने क्या गलती की है॥ मेने फ़िर से ज़ोर से पढ़ा ...हिममता और महेनता ॥ हेहेहे ॥ फ़िर से हँसे सब ॥ भइया, बोले क्या पढ़ रहा है , ध्यान से पढ़, मेने पढ़ा ही ममता और महेनता ॥ गलती मेरे नही थी ॥ आप मत हंसिये ,, फ़िल्म का नाम था हिम्मत और महेनत ॥ पर मेरा मात्र ज्ञान मजोर था जैसा जी सब के साथ शयद होता होगा,, पर यादो के पटल पर ये वाली बात आज तक ताज़ा है और याद कर के आज में सब ह...

शादी के बाद

(ये केवल एक मज़ाक है॥ :) शादी के बाद शादी के बाद पहले पांच सालों तक पत्नी अपने पति को कैसे बुलाती है, इसकी एक बानगी - पहला साल : जानू ! दूसरा साल : ओ जी ! तीसरा साल : सुनते हो ? चौथा साल : ओ मुन्ने के पापा ! पांचवा साल : कहां मर गए? -सौजंन्य से NDTV

शादी की वजह - मुंशी प्रेमचंद

भाई अब शादी में १ महिना ही बचा है पर बैठे बैठे सोच रहा था की लोग शादी क्यों करते है, कई कारण होते है , पर तभी मेरी नज़र प्रेमचंद के एक व्यंग पर गई जो की इसी बारे में है ,, तो मेरी बक बक की जगह आप ये प्रेमचंद का लेख देखिये जो की ‘जमाना’ पत्रिका के मार्च, १९२७ के अंक से लिया गया है और सोचिये की आज और उस ज़माने में परिस्थितियों में ज़्यादा परिवर्तन नही आया है शादी की वजह यह सवाल टेढ़ा है कि लोग शादी क्यो करते है? औरत और मर्द को प्रकृत्या एक-दूसरे की जरूरत होती है लेकिन मौजूदा हालत मे आम तौर पर शादी की यह सच्ची वजह नही होती बल्कि शादी सभ्य जीवन की एक रस्म-सी हो गई है। बहरलहाल, मैने अक्सर शादीशुदा लोगो से इस बारे मे पूछा तो लोगो ने इतनी तरह के जवाब दिए कि मै दंग रह गया। उन जवाबो को पाठको के मनोरंजन के लिए नीचे लिखा जाता है—एक साहब का तो बयान है कि मेरी शादी बिल्कुल कमसिनी मे हुई और उसकी जिम्मेदारी पूरी तरह मेरे मां-बाप पर है। दूसरे साहब को अपनी खूबसूरती पर बड़ा नाज है। उनका ख्याल है कि उनकी शादी उनके सुन्दर रूप की बदौलत हुई। तीसरे साहब फरमाते है कि मेरे पड़ोस मे एक मुंशी साहब रहते थे जिनके ए...

ब्रेकिंग न्यूज़

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आतंकवादी हमला हुआ मरे ढेर से लोग ,टीवी वाले लाशो पर करे शोर पर शोर , करे शोर पर शोर खून की खेले होली ,आतंकी के साथ मारदो इन को भी एक एक गोली सब से पहेले सब से तेज़ , करे ये हर समय बहस देश हित का सोचे बिना ये करे भावनाओं को कैश लोगो की मौत को बना कर ब्रेकिंग न्यूज़ , बस चले तो ये लाशो से भी मांगे व्यूस , लाशो से भी मांगे व्यूस, इनके लिए है ये मेगा इवेंट, जम गए फौज के पीछे लगा कर ये तम्बू टेंट और देश के नेता है , लगे है राजनीती करने नेता करे बाते बाते पर कोई ना जाए बॉर्डर पर मरने कोई न जाए बॉर्डर पर मरने , देश में ही करे ये भेद हिंदू को मुस्लिम से लड़ा कर करें एक थाली में छेद सो रहे ग्रह मंत्री , मन मोहन का भाषण भी मौन , केवल कहने भर से होता क्या है , प्रश्न ये की करे कुछ कौन ?

अपने अपने मदिरालय

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला, 'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला, अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ - 'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।' क्या समझे , नही नही में कोई प्रवचन नही दे रहा हु ,, की बच्चन साहब का कहना ये है की अगर जीवन में एक राह चलोगे के तो आपने जीवन के सपने को पा सकते है पर में तो बता रहा हु की शयद उस समय भी परिस्थितिया कुछ ऐसी होंगी जैसी की आज है। गाँधी के इस देश में सारी राहे किसी ना किसी मधुशाला में ही जा कर ख़तम होती है, चारो और मधुशालाये ही है। चाहे वों गन्ने के रस की ही क्यो ना हो पर मधुशाला तो है, कहेने का मतलब ये है की हर व्यक्ति कही भी जाए प्हुचाता मधुशाला ही है, चलो पॉइंट पर आता हु, शायद आप बोलेंगे की पागल हो गया है ये आदमी तो ,, पर नही लोग सब और मस्त है , क्या हो रहा है चारो और कोई मतलब नही बस अपन घर पहुँच जाए काफ़ी है .....